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Showing posts from 2015

तीसरा रास्ता एन जी ओ पर केंद्रित उपन्यास के दो अंश

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तीसरा रास्ता उपन्यास के दो अंश  राजनीतिक व सामाजिक रूप से तीसरा रास्ता क्या हो, कैसा हो? एन.जी.ओ. संस्कृति ने क्या सामाजिक बदलावों के लिए ईमानदारी से प्रयास किया? एन.जी.ओ. की गतिविधियों का यथार्थ लेखा जोखा प्रस्तुत करता उपन्यास है तीसरा रास्ता... तीसरा रास्ता फन्ड राजनीति के घालमेल पर से भी पर्दा उठाने का एक प्रयास है. देखें.....                                                   गोत्र ठीक एक साल पहले सुधा मानवाधिकार जन समिति में एक्टिविस्ट की तरह भर्ती हुई थी और अमरेश सुधा से साल भर बाद सहायक एकाउन्टेन्ट के पद पर। उस समय निखिल दा वहां एकाउन्टेन्ट विभाग के सर्वे-सर्वा थे। संस्था के मंत्री जी भी उन्हें सलाम बजाते। उन दोनों के रिश्ते में ऐसा क्या कुछ था कि दफ्तर की सामान्य परम्परा भी उनमें न दिखती, किसी को कुछ नहीं मालूम। मालूम तो सुधा के बारे में भी किसी को कुछ नहीं था सिवाय इसके कि वह नशीली हवा की तरह है, तीस साल के भीतर वाली युवती, भरपूर जवानी औ...

ढूह वाली लछमिनिया

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 ढूह वाली लछमिनिया (रामनाथ शिवेन्द्र)उपन्यास के दो अंश                                             सलीमा   सूरज से उजाला लगातार दूर होता जा रहा था और वह पश्चिम की ओर थका थका सा उतर रहा था मानो ऊॅची सीढ़ी से उतर रहा हो, एक ऐसी सीढ़ी जो आसमान को धरती से जोड़ती हो. वैसे भी कुछ खास जगहें ऐसी होती हैं, जहां सूरज का उजाला अपना रोब-दाब गांठ नहीं पाता. मिट्टी के ऊॅचे ऊॅचे ढूहों, बड़े बड़े छतनार पेड़ों, घाटियों की अमापित गहराइयों में किसी निरीह बेवश प्राणी की तरह अपने नैसर्गिक प्राधिकार उजाला की भीख मांगता हुआ कभी भी सूरज को डूब कर छटपटाता देखा जा सकता है. पर उजाला तो दूर छिटका पड़ा था जिससे परेशान थी लछमिनिया. आखिर कब तक पहुंचेगी घर? अभी डेढ़ कोस चलना होगा, बघनलवा भी तो नहीं आया. लछमिनिया डरती है अन्धेरों से, वे लीलने लगते हैं पोर पोर. देह की गांठें सूज जाती हैं और वह घिरनी बन जाती है. घरनी और घिरनी बनना दोनों उसे पसन्द नहीं, इसके लिए उसे जाने कितनी बार अन्धेरों और उजालों के...

सहपुरवा के अंश

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             सहपुरवा के अंश  सहपुरवा 1978 में विन्ध्य प्रकाशन द्वारा प्रकाशित किया गया था. यह उपन्यास आपातकाल कर क्रूरताओं के विवरणों पर केन्द्रित है.. सामान्य सी एक दलित महिला कैसे अपनी तथा गांव की सुरक्षा के लिए संघर्ष करती है और व्यवस्था से टकराती है... इसका पुनर्प्रकाशन ई बुक के रूप में  देश की मानी जानी साहित्यिक पत्रिका प्रेरणा ने किया है...  यहां प्रस्तुत है सहपुरवा के अंश...... ‘का रे! बिफना रापटगंज में कवि सम्मेलन हवइ, चलबे के नाहीं, चलु बुड़बक हमहूं चलब, देखु परसाल बुल्लू के बिरहवा में केतना मजा अयल रहऽल, कवि सम्मेलनवा में तऽ ओहू से ढेर मजा आई’ ‘का सोचत हए आर! बोलते काहे नाहीं....’ फेकुआ हल जोतते हुए बिफना से सवाल पूछ रहा था. बिफना भी उसके साथ हल जोत रहा था, उसने तत्काल हल चलाना बन्द कर दिया और बैलों की जोड़ी को खेत के एक किनारे खड़ा किया, बैलों को सहेजा भी... ‘होर्र होर्र..’ फिर जेब से सुर्ती निकाल कर मलने लगा. ‘संघी लोगन अइसहीं खड़ा रहऽ कहीं भागा जा जीन’ फेंकुआ ने बैलों को सहेजा, फिर बिफना से ... ‘हां रे बिफना परउ ...