ढूह वाली लछमिनिया
ढूह वाली लछमिनिया (रामनाथ शिवेन्द्र)उपन्यास के दो अंश
सलीमा
सूरज से उजाला लगातार दूर होता जा रहा था और वह पश्चिम की ओर थका थका सा उतर रहा था मानो ऊॅची सीढ़ी से उतर रहा हो, एक ऐसी सीढ़ी जो आसमान को धरती से जोड़ती हो. वैसे भी कुछ खास जगहें ऐसी होती हैं, जहां सूरज का उजाला अपना रोब-दाब गांठ नहीं पाता. मिट्टी के ऊॅचे ऊॅचे ढूहों, बड़े बड़े छतनार पेड़ों, घाटियों की अमापित गहराइयों में किसी निरीह बेवश प्राणी की तरह अपने नैसर्गिक प्राधिकार उजाला की भीख मांगता हुआ कभी भी सूरज को डूब कर छटपटाता देखा जा सकता है. पर उजाला तो दूर छिटका पड़ा था जिससे परेशान थी लछमिनिया. आखिर कब तक पहुंचेगी घर? अभी डेढ़ कोस चलना होगा, बघनलवा भी तो नहीं आया. लछमिनिया डरती है अन्धेरों से, वे लीलने लगते हैं पोर पोर. देह की गांठें सूज जाती हैं और वह घिरनी बन जाती है. घरनी और घिरनी बनना दोनों उसे पसन्द नहीं, इसके लिए उसे जाने कितनी बार अन्धेरों और उजालों के बिगड़ैल चमकों से यातनादायी भिड़न्त करनी पड़ी है.रास्ते की थकान से चिन्तित लछमिनिया को आहिस्ता आहिस्ता अन्धेरा जकड़ता जा रहा है, वह पैरों की गति हाउर हाउर बढ़ा रही है जिससे जल्दी घर पहुंच सके. एक से एक मिट्टी के ढूह, ऊॅचे ऊॅचे, उसे अपनी छाया और आभा में छिपाते जा रहे हैं. वह एक ढूह पार करती दूसरा चला आता. रास्ते का सूना-पन सांय सांय, किसी पेड़ की सूखी टहनी भी गिरती तो झम्म जैसी आवाज होती फिर वह खुद को देखती, सारा कुछ ठीक ठाक होता, सारी देह स्थिर, उसके हिस्से यथा स्थान. वह स्वभावतः देह से अलग और दूर होते हिस्सों से सावधान रहती खास तौर से उन हिस्सों से जो उसे जवान बनाते, जिन पर लोगांे की रंगीन पुतलियां अश्लीलता का नाच नाचतीं.
जंगल विभाग की किकुड़ियायी पगडंडी ऐंठी हुई सिकुड़ने का नाम न लेती. लछमिनिया को जान पड़ता कि पगडंडी अपनी लम्बाई बढ़ा रही, गदराई तो थी ही गोल मटोल, कई कई तिराहों चैराहों के साथ, कई कई गांवों को जोड़ती. अन्धेरे में पगडंडी के लचीले मोड़ों को पहचानना कठिन था सो लछमिनिया घूर घूर कर अपना चलना पोख्ता करती चलती, कहीं वह किसी दूसरे रास्ते पर तो नहीं चल रही? उसने खुद को पोख्ता किया कि वह सही पगडंडी पर ही चल रही जो उसे गांव तक ले जाएगी. पगडंडी का सूनापन उसे अखर रहा था यदि चहल पहल होती तो वह उसमें डूब जाती फिर काहे का डर लेकिन गांव तो गांव, वह भी जंगल और पठारों का, जहां दिन में भी चीखता गरजता अन्धेरा. अन्धेरे की सुबह अन्धेरे की शाम, कभी पीठ पर चढ़ती उतरती तो कभी पेट पर, उसी में जीवन जीने की हंसियां, गुदगुदियां तलाशना फिर किसी दूसरी विधवा सुबह की प्रतीक्षा करना, हांथों को काम देना, कभी खंचिया पकड़ना तो कभी फावड़ा.
हंसुआ की बात दूसरी, वह तो अपना औजार है, आजमाया हुआ, फसलों की कटनी करो या..... लछमिनिया के पैर जकड़ गये आगे बढ़ने का नाम ही नहीं ले रहे. वह असफल कोशिश कर रही फिर भी सकारात्मक परिणाम नहीं, आखिर ऐसा क्यों? लछमिनिया झुक कर तलवा देखती है, उंगलियों को झटका देती है, पैरों को किसी अभ्यस्त योगाभ्यसियों की तरह झटकती है फिर वह सामान्य हो कर आगे बढ़ती है और हंसुआ की दर्दनाक कहानी में उलझ जाती है उस दिन उसके हांथ में हंसुआ न होता तो....
दर्दनाक होता, चीखों की भी चीखें निकल जातीं, वह जहरीला धूंआ पीती और निढाल सी ऐय्याशियों का बिस्तरा बन जाती.
लछमिनिया अचेत नहीं थी, वह दूसरे की ऑखों की क्रूरताओं को जानती थी तथा अपनी देह की गंध को भी, जो उसे बरबस ही नारी से नारा बनाती थीं. लेकिन वह नारा नहीं थी जिसे किसी दीवार या पीठ पर जब चाहा लिख दिया. अधिकारी छटपटा कर रह गया था, लगा था माफी मांगने.
अधिकारी रंगीन दुनिया वाला आदमी था तथा अक्सर दिन में सपने देखा करता था. उसके सपने में स्वतंत्रता दिवस के पहले से ही लछमिनिया तैरने लगी थी किसी रहस्यमयी परी की तरह, अधिकारी ने उसे पहली बार तब देखा था जब जिला मुख्यालय पर लोककला महोत्सव आयोजित किया गया था.
लछमिनिया लोककला महोत्सव में शामिल थी तथा उसका प्रस्तुतीकरण ठीक क्या बहुत ठीक था. जवान होती दस लड़कियों की झुन्ड में लछमिनिया का करमा नृत्य किसी के भी तन तथा मन को उŸोजित कर सकता था, मानर की मादक धुन और लछमिनिया की देह संगति ने अधिकारी को देह के कौतुकों में उतार दिया था. अधिकारियों की अग्रपंक्ति में बैठा अधिकारी लछमिनिया का करमा नाच देख कर झूमने लगा. उसे जान पड़ा कि उसने दारु नहीं गदराया बसंत पिया है और तालाब के स्थिर जल को उंगलियों के पोरों से हिला रहा है. हिलता हुआ जल लहर बन कर तालाब के किनारों को चूम रहा है. उसने बैठे बैठे ही लहरों को चूमना चाहा तभी लछमिनिया ने करमा का तान छेड़ा....
अइसन जनम जग छोड़ि के पहाड़े डेरा हो......
गीत के दूसरे शब्द तो मंच पर कहीं बिखर गये पर ‘हो’ उसका स्वर गूंज बिलंबन जो किसी लम्बी तान की तरह था सीधे जा पहुंचा अधिकारी के पास. ‘हो’ जो गीत का सार्वजनिक संबोधन था, सारी सृष्टि के लिए उसी में अधिकारी डूबने उतराने लगा मानो वह हो सिर्फ और सिर्फ उसी के लिए हो.
अधिकारियों की जमात में बैठा अधिकारी पहली बार हो वाले तान को सुन रहा था. एक असामान्य सा संबोधन लहरों की तरह एक किनारे से दूसरे किनारे तक इठलाता, लहराता. ‘हो’ के तान में पहले के सारे शब्द किसी यौगिक के तरह घुले हुए और अंत में ‘हो’ एक लम्बी यात्रा जैसा, पड़ाव हीन पर कौतुक पूर्ण. पड़ाव भी सिर्फ लछमिनिया, उसकी देह व उसकी ऊर्जा.
सचेत हो कर अधिकारी ने खुद को विश्लेषित किया, वह किस यात्रा पर निकल रहा, किस दबी थकी हारी ऊर्जा को महसूस रहा, वह दृढ़ क्यों नहीं रह सकता उसे दृढ़ रहना चाहिए लेकिन क्यों? अधिकारी के पास क्यों जैसे प्रश्न के समरुप उत्त रों के दूसरे विकल्प न थे.
इसमें क्या है? इस तरह की मादक लड़कियां, गरीब ,आदिवासी रोजी रोटी के लिए मोहताज मुलायम गद्देदार बिस्तरों पर थिरकने से परहेज नहीं करतीं. वह सोनभद्र को साल भर से देख रहा है. बनारस से लेकर शक्तिनगर या इलाहाबाद वाले राजमार्गों पर स्थित ढाबों, व पड़ावों के आस पास कहां नहीं हो रही देह की हास्यस्पद लीलायें?
अधिकारी ने कामक्रीड़ा की प्रश्नोत्तरी बनी लछमिनिया को नाचते हुए एक बार फिर देखा, पांवों की गति, हाथों की चपलतायें, देह के प्रक्षेपित आकर्षण, अधिकारी को लगा कि वह हिल रहा, पहले इस तरह की उसकी दृढ़ता नहीं टूटी वह टूट रहा है, एक आदिवासी बाला के निर्पेक्ष नृत्य कौशल पर, उसमें डूब जाने के लिए आतुर हो रहा है.
लोककला महोत्सव समाप्त हो जाने के बाद एक दिन अधिकारी लछमिनिया के गांव पहुच गया. शासन द्वारा उसे आदेश मिला था कि वह करमा नाचने व गाने वालों की विभिन्न टोलियों के नृत्यों की विडियोग्राफी कराये तथा उसे केन्द्रीय सरकार के पास भेजे. इस कार्य के लिए राज्य सरकार ने समय सीमा निर्धारित कर दिया था जो अधिकारी के अनुसार काफी कम था. करमा नाचने व गाने वालों की टोलियां जंगली गांवों में निवास करती थीं जहां पहुंचना कठिनाई भरा था. सरकारी आदेश तो आदेश, उसमें कुछ भी बांयां दायां करना मुश्किल, अवहेलनात्मक, जिलाधिकारी कड़ियल और अड़ियल और अपने लिए रबर से भी मुलायम, सचिचालय की महत्व पूर्ण कुर्सियों से चिपका हुआ, जाने कब और कैसा काम आ जाए. अधिकारी कई बार जिलाधिकारी के आतताई उपदेशों को सुन चुका है.
जिलाधिकारी भी जिलाधिकारी, राजधानी की पुतलियों को अपनी पीठ पर चस्पा किया हुआ. जिले में किसी भी अधिकारी ने उसके साथ क,ख,ग किया दूसरे दिन वह उसे एक्स, वाई, जेड. बना कर या तो मुख्यालय से चिपकवा देता था या तो दूर दराज के गांवों में भिजवा देता था जहां ऊपरी कमाई गोबर होती थी. गोबर का क्या कहीं भी मिल जाएगा.
जिलाधिकारी ने अधिकारी को सख्ती से चेताया था कि विडियोग्राफी में एक दिन की देरी भी दंडनीय होगी, अधिकारी ने घर जाने का कार्यक्रम इस सख्त आदेश के कारण स्थगित कर दिया और विडियोग्राफी के लिए निकल गया था. स्वाभाविक स्थिति होती तो वह जिलाधिकारी से सरकारी गाड़ी की मांग करता फिर उस पर सवार हो कर जाता क्योंकि उसके विभाग की गाड़ी वर्षों से मरम्मत के अभाव में सड़ रही थी, पर उसने ऐसा नहीं किया.
अधिकारी ने अपने समरुप एक पत्रकार से गाड़ी का इन्तजाम करवाया. उस पत्रकार के लिए गाड़ी का प्रबन्ध करना कठिन नहीं था, वह जिले के तमाम ऐसे लोगों का दुलरुआ था जो रुपयों पैसे वाले थे तथा जिनका काम शासन प्रशासन की गुप्त खिड़कियों से अक्सर पड़ा करता था. पत्रकार उन खिड़कियों से उन लोगों को झांकता, इशारा करता फिर देखते देखते उन के काम करा देता. पत्रकार इस गतिविधि को संपर्क गढ़ने का कौशल समझता जो कि आजकल लोकप्रिय भी है इसीलिए उसने अपनी पीठ पर सफलता के गोदना गोदवा लिए हैं हालांकि यह असंभव काम है पर उसे तो अपनी पीठ रंगनी ही होती और वह अपनी देहाती बीबी को उन खास करतबों के बारे में जरुर बताता जिसे वह प्रशासनिक अधिकारियों से लेन देन के द्वारा निपटवाता.
अधिकारी द्वारा गाड़ी की मांग होते ही पत्रकार खुश खुश ‘चलो साहब ने गाड़ी तो मांगा’
अब उसे सभाओं तथा मीटिंगों में जाने से नहीं रोका जा सकता जिनमें पास की जरुरत पड़ा करती है. एक बार तो उसे सुरक्षा कर्मियों ने सभा स्थल से बाहर निकाल दिया था जब कि वह पत्रकारों की पंक्ति में बैठा हुआ था. किसी सुरक्षाधिकारी को यह बात मालूम हो गई कि एक दो लोग बिना पास के पत्रकार गैलरी में बैठे हैं फिर क्या था?
पत्रकार पकड़ लिया गया और उसे निगरानी में तब तक रखा गया जब तक मुख्य मंत्री जी की जादुई सभा समाप्त नहीं हो गई. सुरक्षा की जकड़बन्दी से पत्रकार हंसते हुए निकला कि ‘इतना तो होगा ही ’प्रशासनिक अधिकारी चेहरा नहीं आभा देखते हैं चम,चम, जगमग, जगमग करती हुई. पत्रकार ने उस दिन अपने आत्मबल को ठोस और ठस्स बनाया कि आभा को बिजुरी माफिक चमकाना है पर आभा को जगमग बनाना आसान नहीं, उसका कोई वैज्ञानिक तरीका भी नहीं, यह तो कला का एक रुप है जटिल और उलझा हुआ. उसे सारा कुछ सीखना होगा फिर क्या था वह प्रशासनिक अधिकारियों के अगल बगल परछाईं बन गया और उनके जीवन की उन कमियों की तलाश करने लगा जिन्हें मानवीय कमी माना जाता है. कमियां किसमें नहीं होतीं? सिर्फ ढंकी तुपी रहती हैं उन्हें खोलने व उघारने का काम कोई कलाकार ही कर सकता है, उसके सारे रेशे खिले अधखिले दिखने लगेंगे. पत्रकार उन रेशों पर जादुई पालिस चढ़ाता फिर तो अधिकारी वही करते जो वह उनसे करवाना चाहता हालांकि यह प्रक्रिया जटिल तथा उबाऊ होती, इसमें खतरे भी होते, किसे नहीं मालूम कि अधिकारी द्वारा डसे जाने पर बचना मुश्किल, वैचारिक मृत्यु और उसकी कष्टदाई अनुभूति ही तो बचती.. वैसे पत्रकार भाग्यशाली था वह आठ-दस साल से अधिकारियों की कमजोरियों को अपने द्वारा संशोधित जल से नहलवा रहा है पर किसी अधिकारी ने अब तक उसे नहीं डसा वैसे भी अधिकारियों के पास अब फन कहां?
पत्रकार से गाड़ी का प्रबन्ध करने के लिए कहते समय ही अधिकारी ने उससे आग्रह किया था कि आपको भी साथ चलना है. पत्रकार राजी हो गया था, उसके लिए तो यह एक सुनहरा अवसर था फिर जंगली गांवों की यात्रा शुरु हुई थी. सबसे पहले निश्चित किया गया था कि लछमिनिया के गांव चला जाय फिर दूसरी बस्ती की तरफ.
लछमिनिया का गांव कैमूर की पहाड़ियों की गोदी में बसा हुआ था जहां से दो तीन किलोमीटर दूर सोन नदी बहा करती थी. गांव के चारों ओर पहाड़ियां थीं बीच में खाली मैदान था जो कविता की दृष्टि से काफी मनोरम था. वारिश के दिनों में पहाड़ियों से छन कर पानी जब मैदान में झरने लगता फिर तो जान पड़ता कि पहाड़ियों के गर्म गर्म आंसू बह रहे हैं. पहाड़ियां प्रथम द्रष्टया देखने पर विरह से पीड़ित दिखती थीं मानों उनके निष्ठुर प्रेमी ने उन्हें छोड़ दिया हो. कहीं एक भी छतनार पेड़ नहीं, न साखू न शीशम न महुआ, आम अमरुद और नीम का तो सवाल ही नहीं. पहाड़ी के नीचे करीब दस पन्द्रह एकड़ का समतल जैसा एक भूखंड था और इसी भूखंड पर लछमिनिया की बस्ती थी जहां लछमिनिया रात और दिन की गुदगुदियां व हंसियां पिया करती थी. लछमिनिया की बस्ती तक किसी चार चक्के की पहुंच संभव नहीं थी ऐसी स्थिति में अधिकारी की गाड़ी पास वाली पहाड़ी पर जा कर रुक गई फिर वहां से पैदल ही उतरना था.
रास्ते में ही अधिकारी ने चरिŸार को ले लिया था, वह एक चालू किस्म का आदमी था और मुख्यालय पर आयोजित किये जाने वाले लोक संस्कृति समारोहों में भागीदारी के लिए करमा मंडलियों को ले जाया करता था. एक तरह से वह गरिमापूर्ण प्रबन्धन क्षेत्र का आदमी था तथा ऐसे लोक नर्तकों की खोज कर लिया करता था जो लोगों के दिलों को रसदार बना दिया करते थे. लछमिनिया भी चरिŸार की ही खोज थी हालांकि वह बचपन से ही गाने बजाने में माहिर थी फिर भी उसकी तब कोई उल्लेखनीय पहचान नहीं थी. वह आदिवासी जमात की सामान्य सी लड़की जगह जगह उछल कूद तक सीमित रहने वाली, तब वह दिलचस्पी की चीज नहीं थी. चरित्र र तो चरित्त र था समयानुसार अपने में बदलाव करने वाला. उसने एक दिन लछमिनिया को देखा, उसके देखने में लछमिनिया खुद से अलग थी, उसकी देह उससे बाहर थी. देह के सारे हिस्से स्वायत और स्वतंत्र पर उनकी संघात्मकता में कहीं अलगाव नहीं. चरिŸार के लिए यह अद्भुत और कौतुक भरा था. उसे अचरज हुआ ‘क्या आदिवासी बाला भी इतना देखनार और छतनार हो सकती है? सुघरई और सुगढ़ई से लदी फदी.’ फिर तो चरिŸार ने लछमिनिया को भी अपनी मंडली में शामिल कर लिया.
चरिŸार, पत्रकार और अधिकारी के आगे आगे पहाड़ी उतरने लगा. पहड़ी से नीचे उतरने का आसान रास्ता था जो घुमावदार था पर रास्ते जैसा दिखता था. थोड़ी ही देर में लछमिनिया का घर मिल गया जो पहड़ी की ऊंचाई से देखने पर किसी ढूह जैसा दिखता था, धरती पर प्राकृतिक ढंग से उगा तथा प्रकृति द्वारा बनाया हुआ.
लछमिनिया की बस्ती कुल जमा पन्द्रह परिवारों की थी तथा सभी एक जाति समूह घसिया बिरादरी के थे. पारंपरिक रुप से इनका काम टोकरी, सूप, दउरी बेना, डलिया आदि बनाने का था.
बस्ती में अधिकारी का उतरना किसी देवता के अवतार लेने सरीखा महसूसा गया. चुनाव के दौरान भी इस बस्ती के अगल बगल जीप या कारें नहीं दिखा करतीं. चरित्त र ने घूम घूम कर बस्ती वालों को बताया कि बहुत बड़े साहब आये हैं फिर क्या था पूरी बस्ती की आंखें दैवीय ताकतों वाले साहबों के बड़प्पन और महिमा में डूब गईं. कौतूहल इतना बढ़ा कि नर नारी बच्चे सभी लछमिनिया के घर पर. लछमिनिया के घर के सामने खाली जगह थी जिस पर चट्टानों का कब्जा था जो प्रकृति द्वारा बनाये गये फर्श जैसा था, समतल और चिकना.
बस्ती के नर नारियों के मन में एक ही सवाल था ‘साहब क्यों आये हैं?’ इसका उत्तर केवल चरित्तर और साहब के पास था. चरित्तर ने बस्ती वालों को बिस्तार से बताया कि सलीमा बनेगा जो दिल्ली तक जाएगा. साहब यहां कलाकारों से मिलने आये हैं. करमा की सारी टोलियों को मुख्यालय पर बुलाया जाएगा वहीं सलीमा बनेगा.
चरित्त र ने जिन जिन नर्तकों व नर्तकियों को साहब के सामने प्रस्तुत किया साहब ने सभी का नाम पता अपनी डायरी में चढ़ा लिया. पहाड़ी पर जीप देख कर दूसरी बस्तियों के लोग भी आ गये थे सो वहां किसी राजनीतिक सभा जैसी भीड़ हो गई थी फिर भी लोक कलाकार भीड़ से बाहर दिख रहे थे जिन्हंे पत्रकार और साहब नख शिख निहार रहे थे.
पहाड़ व जंगल से मैदान की तरफ रात में वापस आना खतरा भरा होता है सो चरित्त र और बस्ती वालों ने साहब को रोक लिया कि सुबह वापस होना ठीक रहेगा. साहब भी अतिरिक्त साहस का अभ्यस्त नहीं था सो रात में रुक गया. रात तो रात कई तरह के उत्सवों का समूह. रात में करमा का नाच हुआ. महुआ की मादक गंध में रात झूमने लगी, साहब झूमने लगा चरिŸार और पत्रकार भी. झूमना तो झूमना कई रंगों में सरोबार, पूरी बस्ती नींद में पत्रकार भी. साहब जागा हुआ, चरिŸार जागा हुआ, अपने जोगाड़ पर कि लछमिनिया साहब की बाहों में होगी, उसे साहब की बाहों में होना भी चाहिए...
तभी लछमिनिया ने हंसुआ उठा लिया और साहब ...
साहब गिड़ गिड़ाने लगा ‘बस्ती में जगरन हो गई तो मारा जायेगा’ चरिŸार कांपने लगा, ऐसा पहले कभी उसने नहीे देखा था. जाने कितनी बार उसने देह की थालियां साहब सूबों के लिए परोसा है, सजा सवार कर...., लछमिनिया तो कटार हो गई .....
फिर साहब रात भर जीवन की भीख अपने आराध्य देवताओं से मांगता रह गया था. साहब अभी तक नहीं भूल पाया है ढूह वाली लछमिनिया को जिसे वह हसुआ वाली बोलता है.
लछमिनिया नहीं भूल पाती बीता हुआ. कहीं भी जाती है सावधान रहती है. पगडंडी पर चलते हुए भी वह सचेत और सावधन थी हालांकि रात का अन्धेरा उसके साहस और आत्म विश्वाश को कमजोर बना रहा था फिर भी ऐसा नहीं था जिससे पगडंडी पर चलना बन्द कर देती. उसे तो जल्दी घर पहुंचना और रास्ते में सलीमा बनने से खुद को बचाना था.
तूं लक्ष्मी है रे
लछमिनिया देर रात तक घर पहुंची. उसने भवानी माई और जोगीडीह की प्रार्थना की, उन्हें धन्यबाद दिया कि ‘तुम्हारी किरपा से मैं सकुशल घर वापस आ गई’.
लछमिनिया ने प्रार्थना करने का तौर तरीका अपनी अइया से सीखा था. अइया जब भी परेशानी महसूसती सीधे भवानी माई की प्रार्थना करने लगती. प्रार्थना में धंागरी व भोजपुरी के शब्द समूह होते तथा एक लघु कथा होती कि तुम्हारी कृपा से फलां की बिपत्ति का निवारण हो गया, मेरी बिपत्ति का भी निवारण करो.
लछमिनिया ऐसे अवसरों पर अइया को गंभीरता से लेती तथा प्रार्थना के एक एक शब्द को याद करने की कोशिश करती. अब तो उसे सारा कुछ याद है, अइया के सारे भजनों को बेहतर राग और धुन से वह गा सकती है.
लछमिनिया के घर पहुंचते ही उसकी अइया ने भी भवानी माई की चौरी पर अगरबŸाी जलाया फिर गीत गाया. बाद में अइया ने लछमिनिया से सवाल दर सवाल पूछना शुरू किया ‘काहे देरी कर दी, अन्हरिया में काहे चली? जानती नहीं अन्हरिया मंग्गर की तरह पूरी देह लील जाती है. जंगल में अब जंग लग गई है, पहले की तरह नाही है धरती, चाहे जहां जाओ, वापस आओ, अब तो रस्ते के पेड़ भी राक्षस बन गये हैं’.
अइया मैं का करती, जैसे जैसे मजूरी मिलती गई सब निकलते गये, हमारे टोले वाले भी निकल लिए, दूसरी जून हमारा नम्बर आया. सेकरेटरिया हरामी है अइया चाहता तो हमारी मजूरी पहले ही दे देता टोले वालों के साथ. पूछ रहा था ‘तोहार अइया काहे नाहीं आई? तोहार नाम तो रजिस्टर में नाहीं है, कौन अंगूठा ठेपेगा? जाओ बाहर बैठो, आखीर में देखेंगे कि तोहार का हो।’ आखीर आते आते सुरूज देवता जम्हाने लगे, अन्हार हो गया हर तरफ तूं तो जानती ही है कि हमैं अन्हार से बहुत डर लगता है, मैं घबराने लगी, अकेली गांव कैसे लौटूंगी रात में? पर हमने भी ठान लिया था अइया.... कि मजूरी ले कर ही लौटना है.
अन्हार होते होते तक मजूरों की भीड़ छट गई थी. वहां दो चार लोग ही बाकी रह गये. परधान जिला पर गया था केवल सेकरेेटरियय था, उसने मुझे बुलाया और सात दिन की मजूरी का साढ़े तीन सौ रुपया दिया. हमने रुपया गिना, सीधे पूछा काहे साढ़े तीनय सौ दे रहे हैं, सात सौ हुआ नऽ, सात सौ रुपया दीजिए’
पचासै रुपया रोजीना का दिया जा रहा है, सभै को यही दिया गया है’ सेकरेटरिया तमतमा कर बोला जैसे खा जाएगा. फिर बोला जादे बक बक करोगी तो एक रुपया भी नहीं दूंगा, तोहार नाम थोड़य है कारड पर, जा अपनी अइया को बुला ला’
बहुत किच किच हुई अइया, तब जाके पांच सौ साठ रुपया दिया, अस्सी रुपया रोजीना के हिसाब स,े छोड़ दिया हमने ‘जा लूट ले, तेरे बाल बुतरू को काम देगा.’
रात में मैं वहीं रूक जाती पर सेकरेटरिया की ऑख में पाप छलक रहा था अइया, रूकती तो जाने वह का करता वैसे भी वह कन्हैया है सो चली आई भवानी माई का भजन करते. वापस होते समय परधानिन काकी से हंसुआ मांग लिया था. एक बार तो किसी से भिड़ ही लेती.’
हंसुआ मांगने पर परधानिन काकी ने पूछा ‘का करेगी रे हंसुआ?’ मुझे हसी आ गई थी, का बताती उनको कि हसुआ का काम है, जब बताया तो काकी भी हसने लगीं.
मजूरी लेने की बात गंभीर कहानी होती है, लछमिनिया की अइया जानती थी कि जितना मजूरी करना असान होता है उतना मजूरी पाना और उसका हिसाब कराना आसान नहीं. नरम मिजाज से लछमिनिया को समझाया कि हर जगह झगड़ जाती हो ऐसा न किया करो जमाना बहुत खराब है. राड़ वह ले जो सांड़ हो. हमलोग गरीब गुरबा हैं, सबर ही हमारी ताकत है’
लछमिनिया ने अइया की बात को कुछ सुना कुछ अनसुना कर दिया, मन में फुस फुसाई ‘कैसा सबर? कोई जबर होगा तो अपने लिए, हमारा का? हमै कोई रोटी देगा या हमरे घरे का चूल्हा जलाएगा’
अइया तूं बे मतलब डरा करती है, उसने प्रतिवाद किया..
‘अइया तूं इसकी फिकिर न किया कर, तोहार लछमिनिया डरू नाहीं कि किसी ने ऑख दिखाया और उसके गोड़ पर गिर गई. अब मैं बूझ रही हूं कि हमै कोई डराता नहीं, यह जो हमरे भीतर डर है नऽ वही हरदम कंप कपाता रहता है हमैं, ई जो डर है नऽ, न रहे तऽ कोई हमार का बिगाड़ लेगा?
अइया को अपनी बता कर लछमिनिया नींद में चली गई. जाड़े का महीना था. कमरे की कच्ची फर्श पर पुआल का बिछावन पहले से ही बिछा हुआ था. अइया एक मोटा लेवा ओढ़ी हुई थी, लछमिनिया ने भेड़िहवा कंबल उठाया उस पर सूती चादर साटा फिर पुअरा के बिछावन पर पूरी लम्बाई में पसर गई. हाथों पैरों को झटका देकर पैदल चलने की थकान मिटाया फिर नींद में जाने की कोशिश की पर नींद तो नींद, उसमें गोता लगाना आसान नहीं, पहले तो नींद ने अपनी चंचलता दिखाया फिर जाने क्या हुआ कि उसने उसे अपने में समेट लिया.
लछमिनिया को पता ही नहीं चला कि वह कब नींद में चली गई. सुबह जागने के बाद उसके पास नींद की यात्रा वाले सपने नहीं थे न ही वह सेकरेटरी ही किसी राक्षस की तरह परगट हुआ. एक तरह से उसकी नींद दुनियादारी से निर्पेक्ष थी, जैसा कि हर नींद को होना चाहिए.
सुबह लछमिनिया देर से जागी. उसकी अइया ने उसे जगाया भी नहीं, सोने दो, थकी होगी ’अभी से उसे फिकिर में डालना ठीक नाहीं. बिआह हो जाएगा, अपने आप फिकिर में डूब जाएगी, फिर भोरहरियय में जागने लगेगी. ओजरार होते खेत की तरफ जाना ठीक नहीं, लोगों की ऑखें उछलने कूदने लगती हैं.
लछमिनिया किरिन फूटने के बाद जागी और तत्काल खेत की तरफ निकल गई. खेत की तरफ ऑखों का उछलना कूदना उसे कहीं नहीं दिखा, नहीं तो वह जाते समय सोच रही थी कि उसे किसी की बेहया ऑखों में उतराना पड़ेगा. इस तरह ऑखों में उतराना जाने कितनी बार उसने देखा है. पहले वह इसे खेल समझती थी तथा नहीं समझ पाती थी कि उसकी उमर के लड़के उसके अगल बगल भौंरा काहे बने रहते हैं. हालांकि वह अपनी देह में होने वाले आकस्मिक बदलावों से चिन्तित रहा करती थी.
‘हर महीने कितना फालतू खून निकल जाता है, वह छाती के उभारों को देखकर परेशान हो जाती, किसी दिन देखो तो कुछ, किसी दिन कुछ, लेकिन अब तो वह अच्छी तरह देह के करतबों का असली मतलब समझती है तथा यह भी कि रात में उसकी अइया उसे अकेली छोड़ कर कहां चली जाती है? जागने पर अइया और बपई की खुसुर फुसुर साफ सुनाई देती है कि वे फुसफुसा रहे हैं पर यह साफ नहीं हो पाता कि वे क्या बतिया रहे हैं? अचानक लछमिनिया किसी नैतिकता में डूब जाती और खुद को दूसरी तरफ मोड़ लेती कि उसे अइया और बपई की बातें नहीं सुननी चाहिए.
घर आते ही उसे टोले में हल्ला सुनाई पड़ा. घर में अइया नहीं थी. उसका छोटा भाई भी नहीं था, ओसार का टटरा बन्द था, कहां गई अइया? हल्ला की तरफ गई होगी. लछमिनिया हल्ला की तरफ फंलागती हुई दौड़ी. हल्ला के कर्कश स्वर तेज सुनाई पड़ने लगे, साफ साफ...
पकड़ो, पकड़ो बोझा रोक लो मारो सालों को, इसी तरह और भी. फिर लछमिनिया हल्ला की तरफ तेजी से दौड़ी, उससे अधिक वह दौड़ भी नहीं सकती थी. दौड़ते समय असामयिक ढंग से उसे महसूस हुआ कि उसके
उभार उसे दौड़ने नहीं दे रहे, अब वह अइया से कह कर उभारों को जकड़ने वाला खरीदवाएगी, इसमें का लजाना, एक ही बार की तो बात है. लछमिनिया थोड़ी देर में हल्ला के जगह पर पहुंच गई, उसने टोले भर को वहां देखा, शोर थम चुका था. बगल गांव के शंकर यादव और उनके लड़कों को टोले वालों ने घेर लिया है, वहां धान के बोझ भी पड़े हुए हैं, गरम गरम बातें हो रही हैं. टोले का एक आदमी शंकर यादव से तेज आवाज में पूछ रहा हैः
‘ई खेत तोहार कैसे है? जब तोहार था, तब था, अब तऽ भीखू कक्का को पट्टा हो गया है, पट्टे का कागज भी मिल गया है, फिर तूं एमे धान नाहीं गाड़े हो, धान तऽ गाड़े हैं भीखू कक्का. टोले के एक नौजवान ने उसे रोकते हुए जबाब दिया..‘दादा तूं रुको, नाहीं जानते का कि ये गुन्डा हैं, फिर इनका कोई का बिगाड़ लेगा, थानेदार भी तो एन्हई का जाति का है.
‘तो जाये अपने बाप को ही बुला लाये’ पहले ने कर्कश प्रतिवाद किया.. शंकर यादव भी कम न था उसने ललकारा ‘देखो बाप तक न जाओ, एक एक को देख लूंगा. चाहो तो अकेले अकेले फरिया लो, गोल बनाकर छाती फुला रहे हो’.
शंकर यादव के दोनों लड़के घिरे हुए थे फिर भी गरज रहे थे लेकिन उनमें से कोई भी धान की बोझों की तरफ नहीं जा रहा था. धान के महज तीन बोझ ही बंधा पाए थे, बाकी धान बिना बंधे हुए ही खेत में पड़ा था. बोझा बांधते समय ही टोले के किसी ने देख लिया था फिर क्या था उसने घर घर जाकर टोले वालों को बता दिया कि शंकर यादव भीखू कक्का का धान काट कर बोझा बांध चुका है तथा अब ढोने वाला है. साथ में उसके दोनों लड़के भी हैं.
शंकर यादव बेवश सा पड़ा टोले वालों से घिरा था. उसे सपने में भी ऐसा अनुमान नहीं था कि सारे टोले वाले गोलबन्द हो कर उसे रोक लेंगे तथा मार पीट पर उतर जाएंगे. वह तो आदिवासियों को मुर्दा मानता था क्या कर लेंगे ये मरे हुए ढोर? लेखपाल ने उसके कब्जे की इस जमीन का भले ही पट्टा कर दिया है, पर वह कभी भी कब्जा नहीं छोड़ेगा. पट्टा खारिजा के बाबत उसने वकीलांे से बात चीत कर लिया है तथा वकील ने बताया है कि पट्टा खारिज तो नहीं कराया जा सकता लेकिन कानूनी झगड़ा लगवाकर उसे अपने कब्जे में सालों साल रखा जा सकता है. वैसे वकील ने तो उसे समझाया ही था कि तूं धान कटवा लेना, शंकर यादव वकील का बताया ही तो अक्षरशः कर रहा था. शंकर भी कानूनी दांव पेंच जानता था. अब शंकर यादव को का मालूम कि आदिवासी उसके सामने मार पीट के लिए तनेन हो जाऐंगे वह भी घसिया बिरादरी के घुमन्तू, जगह जगह भीख मांगने व नाचने, गाने वाले. भीखू तो वैसे भी मुर्दा है, बात बात में रिरियाता रहता है, एक रात कहीं गुजारता है तो दूसरी कहीं, घर भी शायद ही ठहरता हो. लोरिकी गाने के लिए किसी ने बुला लिया, चला गया. भीखू गाने बजाने में निपुण था. ढोलक की उसकी थापों पर शायद ही कोई ऐसा हो जो झूम न जाए. ढोलक बजाने के लिए वह दांए हाथ की बीच वाली उंगली में लोहे की अंगूठी पहनता, फिर ढोलक बजाता एक बार तो वह टोला छोड़ कर ही कहीं निकल गया था किसी नट के साथ. आल्हा गाना और उसकी धुन पर थाप देना सीख कर ही वापस लौटा था. उसे आल्हा जाने क्यों अच्छा नहीं लगता. आल्हा गाने में बेमतलब सांसें रोकनी पड़ती हैं, कभी रोको तो कभी खींचो. जब लड़ाई गाना होता है फिर तो देह और गले की चीख दोनों को अकड़ू बनाना पड़ता है.
भीखू को लोरिकी मिठास भरी लगती है, भीखू मानता है कि उसके लिए लोरिकी और बिरहा दोनांे ठीक हैं, उसे मउज मिलता है. लोरिकी गाते समय केवल एक बात की सावधानी बरतनी चाहिए कि कान बन्द रखे जांए.
भीखू लोरिकी गाते समय हमेशा कान बन्द रखता है और दूसरे खाली हाथ को किसी योद्धा की तरह हवा में लहराता रहता है. उस समय भीखू के चेहरे पर युद्ध की कर्कश कलाएं थिरकने लगती हैं, उसकी ऑखें लाल हो जाती हैं और वह झूमने लगता है, अपनी प्रवृत्ति और प्रकृति से दूर, किसी के देखने में जो भीखू देखा हुआ होता वह दूर चला जाता वहां दूसरा भीखू दिखता.
शंकर यादव अचरज में था, ऐसे भीखू के लिए सारा टोला गोलबन्द कैसे हो गया? शंकर यादव ने ओजरार होने के पहले ही हालांकि धान काट लिया था पर उसे उठवाकर ले जाना कठिन हो गया. काफी देर बाद घसिया टोले वालों ने शंकर यादव और उनके बेटों को सशर्त छोड़ा कि इधर फिर कभी न आना, जब कभी आना लेखपाल के साथ आना, वह आकर पहले बताए कि कक्का के पट्टे वाली जमीन कहां है?
लछमिनिया हल्ले वाले स्थान पर पहुंच कर भीड़ का हिस्सा बन गई, वह कभी टोले वालों का तो कभी शंकर यादव का चेहरा देखती. बचपन से ही वह शंकर यादव को देखती आ रही है कि पहाड़ पर के सातांे टोलों के आदमी उससे ऑखें नहीं मिला सकते, वह जब जैसा चाहता है, करता है. उसके टोले में जाने पर सारे लोग हाथ जोडे़ खड़े रहते हैं किसी की मज़ाल जो उसके सामने खटिया पर बैठ जाये.
लछमिनिया को अचानक ख्याल आया कि दो तीन साल पहले शंकर यादव ने एक अधेड़ आदमी को मार मार अधमुआ कर दिया था, वह भी अइया के साथ तमाशा देख रही थी. पचासों लोग थे वहां, पर किसी ने उसे रोकने को कौन कहे, पूछा तक नहीं कि वह उनके टोले के आदमी को क्यों मार रहा?
लछमिनिया सारा तमाशा देखती रह गई थी, बाद मे उसकी अइया ने बताया कि वह आदमी पहले शंकर यादव के साथ ही जंगल की लकड़ी चोरी का काम किया करता था. दोनों मिल कर साखू या शीशम काट गिराते फिर कहीं बेच देते. साखू का एक पेड़ शंकर यादव ने काटा था, सूख जाने पर उस आदमी ने मैदानी इलाके के किसी को बेच दिया और सिल्ली भी उठवा दिया. शंकर यादव को जब यह बात मालूम हुई फिर वह मुसहरान आ धमका और उसे मार मार कर अधमुआ बना दिया लेकिन वह भले ही मुसहर जाति का है तो का हुआ वह भी शंकर यादव से कम नाहीं है. यहां का रिवाज भी तो यही है कि जो पेड़ काट कर गिराता है वही बेचता भी है. ऐसा राजा साहब के जमाने से ही चला आ रहा है पहले राजा का करिन्दा चौथिया लिया करता था अब फरिस्टर लेता है. रुपया फरिस्टर को पहुंचाते रहो अउर पेड़ काटते रहो. शंकर यादव ने फरिस्टर को चौथिया दिया था फिर काहे नाहीं मारता?
लछमिनिया अइया को काफी देर तक सुनती रही, अइया ने उसे समझाया भी पर वह कहां समझने वाली थी उसने अइया को रोका..अपना चौथिया ले लेता पर मारा काहे, दूसरा सेखुआ कटवा लेता, उसी आदमी से यहां पेड़ों की कमी तो नाहीं. अइया तूं समझो तो ..कैसे कोई आकर हमरे टोले के आदमी को मार देगा? हाथ में पट्टी बंधी है का? ’लछमिनिया गुस्से में थी, अइया ने उसे समझाया..
‘तोसे का मतलब, तूं आपन देख, बेमतलब दूसरे का घड़ा अपने माथे पर, काहे के लिए फोड़ना, यहां कोई किसी का नाहीं है, सभी मउज लेते हैं अउर हसते हैं, तूं नाहीं जानती टोले वालों को. इस पहाड़ पर एक दो शंकर हों तब नऽ, पहाड़ पर जो भी थोड़ी जगह जमीन वाला है, जिसके यहां साल भर खाने का अनाज है, लडके बाहर पढ़ते हैं, जो अंगूठा नाहीं ठेपता सभी शंकर यादव हैं कोई कम कोई अधिक, किस किस से झगड़ा करोगी?
लछमिनिया अइया को कमजोर नहीं समझती थी, कैसी बतकही कर रही अइया? शंकर यादव गुंडा होगा तो अपने लिए, उससे दूसरे काहे डरने लगें? लछमिनिया लछमिनिया थी, नई उमर नई बात, नई समझ, नई जोश, वह जानेगी भी तो का जानेगी? जमाना कितना बदचलन है उसकी अइया जानती है, शंकर यादव जैसों को, उन्हीं में से यह शंकर भी एक है, भीखू कक्का की जमीन किसी दिन वह हड़प कर ही रहेगा. धन धरम लेना तो उसका रोज का काम है.
लछमिनिया की अइया जब भी लछमिनिया को देखती ऑखें झिलमिलाने लगतीं, सारा कुछ धुन्ध जैसा दिखता, दिखना ही गायब हो जाता, वह कांप कांप जाती, जाने का हो? किसी तरह लछमिनिया का बिआह कर देती, वह अपना घर संभाल लेती, नाहीं तऽ लड़की जात छुई मुई, किसी भेड़िए ने किसी दिन दबोच लिया तो.. मुह दिखाना पाप हो जाएगा.
लछमिनिया की अइया सुबह जागती तो करम देवता की पूजा करती हुई. रात गुजर गई अनहोनी नाहीं घटी, बगल में सोई लछमिनिया को देखती ठीक ठाक है गड़बड़ नाहीं. लछमिनिया के बपई से वह लगातार तीन चार साल से बोल रही है कि कहीं लड़का देखे, किसी तरह बिआह निपटाओ, पर वह सुनता ही नाहीं, अपने में मगन रहता है, बोलता है लछमिनिया बहादुर है, समझदार भी, वह खुद को संभाल लेगी. उसका बिआह ऐसे थोड़य हो जाएगा, किसी नौकरिहा से करना है ओकर बिआह.
लछमिनिया की अइया पति की बातें सुनकर सांसें पीने लगती है, साफ बोलती है, घर बैठे तो कोई लड़का मिलेगा नाहीं, जाना तो कहीं पड़ेगा ही. जाओ कहीं खोजो लड़का, लछमिनिया का जल्दी बिआह करो, तोहरे तरह हमरे ऑख में पट्टी नाहीं बंधी है, हम ओकर रंग रूप देख रहे हैं. देखते नाहीं बाढ़ की तरह देखाती है.
शंकर यादव हाथ मल कर लौट गया उसे कुछ नहीं मिला सिवाय अपमान के, टोले वाले सारा बोझ उठा कर टोले में ले आए उसे पैरों से मसला गया, धान को पुआल से अलगियाया गया, पुआल अलग और धान अलग. धान अलग होते ही भीखू कक्का ने टोले वालों से कहा कि सभी लोग बराबर बराबर बांट कर अपने अपने घर ले जाओ.
लछमिनिया धान मसल कर बैठी थी अइया के साथ. उसने भीखू कक्का की बातें सुना, फटाका बोल पड़ी..
‘बाबा! धान काहे बंटेगा? खेत तोहार है तऽ धान भी तऽ तोहार ही हुआ नऽ. यह तो सभी का काम है फिर मजूरी दे रहे हो का कक्का? काहे की मजूरी? भला बताओ टोले के किसी को कोई तंग करे, मारे पीटे ऐसे में टोले वाले नाहीं भिड़ेंगे फिर कौन भिड़ेगा?’
टोले वाले लछमिनिया का चेहरा देखने लगे, समझदार है. भीखू कक्का लछमिनिया को नहीं पहचान पाये कि वह किसकी लड़की है? वहीं किसी ने बताया कक्का को, फिर कक्का ने उससे उसका नाम पूछा..
‘का नाम है तोहार बिटिया? ’
लछमिनिया बाबा’ उसने बताया, भीखू कक्का ने मन में सोचा ‘सही में तूं लक्षमी है रे अउर दुर्गा भी!
प्रकाशक-----
ज्योति पर्व प्रकाशन नोएडा डेल्ही

Comments
Post a Comment