ढूह वाली लछमिनिया
ढूह वाली लछमिनिया (रामनाथ शिवेन्द्र)उपन्यास के दो अंश सलीमा सूरज से उजाला लगातार दूर होता जा रहा था और वह पश्चिम की ओर थका थका सा उतर रहा था मानो ऊॅची सीढ़ी से उतर रहा हो, एक ऐसी सीढ़ी जो आसमान को धरती से जोड़ती हो. वैसे भी कुछ खास जगहें ऐसी होती हैं, जहां सूरज का उजाला अपना रोब-दाब गांठ नहीं पाता. मिट्टी के ऊॅचे ऊॅचे ढूहों, बड़े बड़े छतनार पेड़ों, घाटियों की अमापित गहराइयों में किसी निरीह बेवश प्राणी की तरह अपने नैसर्गिक प्राधिकार उजाला की भीख मांगता हुआ कभी भी सूरज को डूब कर छटपटाता देखा जा सकता है. पर उजाला तो दूर छिटका पड़ा था जिससे परेशान थी लछमिनिया. आखिर कब तक पहुंचेगी घर? अभी डेढ़ कोस चलना होगा, बघनलवा भी तो नहीं आया. लछमिनिया डरती है अन्धेरों से, वे लीलने लगते हैं पोर पोर. देह की गांठें सूज जाती हैं और वह घिरनी बन जाती है. घरनी और घिरनी बनना दोनों उसे पसन्द नहीं, इसके लिए उसे जाने कितनी बार अन्धेरों और उजालों के...














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