सृष्टि में जैसे जैसे बदलाव हो रहे हैं वैसे ही मानव सभ्यता, संस्कृति व सामाजिक संरचना में भी दिनों दिन बदलाव होते दिख रहे हैं। मानव मूल्य व मान्यताएं तथा सिद्धान्त जो मानव निर्मित क्रियाकलाप हैं, वे भी सुविधाओं की परिधि में अपनी जमीन छोड़ कर भिन्न भिन्न आडबरों में रूपान्ताित होते जा रहे हैं।
श्री रामनाथ शिवेन्द्र का उपन्यास ‘अन्तर्गाथा’ कुछ इन्हीं विसंगतियों पर प्रहार करता हुआ कथा का आकार लेता है। आदमी, आदमी न होकर मात्र अपनी परर्छाइं हो गया है। प्रस्तुत उपन्यास में कथाकार, कवि, ठेकेदार, नेता जैसे कई चरित्रों का पोस्टमार्टम किया गया है। विमर्श की दृष्टि से स्त्री विमर्श, दलित विमर्श, और बहुत से अन्य सभ्यतागत विमर्शों के साथ साथ मानव जीवन में घटित होने वाले बिडम्बनाओं का विश्लेषण किया गया है, जो कथित सभ्य समाज से अन्तर्गुम्भित हैं।
कथा प्रारंभ होती है प्रवासीनाथ जी से जो एक चर्चित उपन्यासकार एवं विश्वविद्यालय के प्रवक्ता है ंतथा सुशीला और अमरेन्दर से, जो उनके निर्देशन में शोध कार्य कर रहे हैं। प्रवासीनाथ सुशीला से नाटकीय ढंग से शारीरिक संबध बना लेते हैं, यही नहीं शारीरिक संबध बन जाने के बाद उन्हें लगता है कि सुशीला उनके प्रस्तावित उपन्यास की पाण्डुलिपि है। प्रवासीनाथ, सुशीला तथा अमरेन्दर के अलावा जो दूसरे चरित्र हैं उनमें एल.आर., कवि विलोचन, जगेशर, प्रधानाचार्या, बंगाली बाबू की बिटिया, जद्दो भाई, बाहुबली विधायक, सुशाीला के चाचा, सांसद तथा सुदर्शन जी आदि। इन्हीं चरित्रों के क्रियाकलापों के विवरणों व विश्लेषणों के द्वारा अन्तर्गाथा की औपन्यासिक जमीन तैयार की गई है। आई.ए.एस. के समकक्ष अधिकारी की बिटिया सुशीला इन्हीं चरित्रों के विभिन्न प्रसंगों पर केन्दित एक फिल्म भी बनाती है।
वैसे प्रवासीनाथ के लिए पप्पू चाय के बैठकबाज चरित्रों का कोई मतलब नहीं होता पर सुशीला उहीं चरित्रों का मूल्य स्थापित करने के लिए अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर देती है जो उपन्यास के केन्द्रीय विषय बन जाते हैं। प्रवासीनाथ के लिए वामपंथ या उसकी अवधारणाएं उतना महत्वपूर्ण नहीं हैं जितना कि एल.आर. तथा जगेशर के लिए हैं। जबकि जगेशर तो प्रवासीनाथ की वामधारा की चेतना से ही प्रभावित होकर चारू मजूमदार के संगठन के साथ जुड़ा था पर उस रास्ते के अन्तर्विरोधों से दुखी होकर बनारस लौट आया था। यही हाल एल.आर. का भी था। वामउग्रवाद के अन्तर्विरोधों का शिकार होने के बाद उसने भी संगठन छोड़ दिया था। जगेशर ने बनारस में दूध बेचने का रोजगार डाल लेने के बाद खुद पान की गोमटी खोल लिया था पर एल.आर. बिना काम के था, खालीपन मिटाने के लिए वामपंथी धारा की एक पत्रिका निकालता था। वह कामरेडों को दो खानों में बांटता था, चुनाव लड़ने वालों को मठी कामरेड मानता तथा चुनाव का विरोध करने वालों को हठी कामरेड। चरित्रों की विभिन्नताओं के कारण पप्पू चाय की दुकान के बैठकबाजों का जुड़ाव बना रहता है।
प्रवासीनाथ की लेखकीय काम के बाबत अपनी प्रस्थापनायें हैं,..तरीके हैं ...
‘‘प्रवासीनाथ थे कि बिना सुरा सुन्दरी के न कुछ लिख पाते थे न किसी का कोई काम करा पाते थे। वे इसे लिखने का रोग मानते थे। सुरा, सुन्दरी से बचने के लिए जिन लोगों ने कुछ न लिखने की कसम खा रखी है, उन्हें वे बहुत अच्छा मानते तथा खुद को बुरा।’’ अपने खास मित्रों से वे सगर्व कहते भी..
‘‘कल्पनाओं के सहारे शब्दों एवं संवेदनाओं से निरंतर सहवास करते रहने से लेखक का मनोरोगी हो जाना स्वाभाविक है’’
साहित्य जगत में प्रवासीनाथ का आतंक अमेरिकी तर्ज पर है, अपनी अपेक्षाओं की चीजों को हासिल कर लेना और दूसरों को देने के नाम पर ऑखें घुरेरना। उपन्यास में विभिन्न कथापात्रों के माध्यम से लेखकीय समाज की पड़ताल करते हुए राजनीतिक विचारधाराओं में व्याप्त विद्रूपताओं व बिडंबनाओं की समीक्षा अद्भुत हैं। अधिकांश पात्र एकल नहीं हैं, उनके साथ कोई न कोई महिला है..एल.आर. के साथ उसकी नर्स मित्र व बंगाली बाबू की बिटिया, कवि विलोचन के साथ एक कवियत्री, जद्दोभाई के साथ उनकी पत्नी हैं तो हनुमान भक्त पाण्डेय के साथ विदेशी लड़की, प्रवासीनाथ के साथ उनकी पत्नी पूसी हैं। प्रवासीनाथ तो प्रवासीनाथ हैं उनके साथ सुशीला भी जुड़ी हुई है। लहा, पटा कर किसी कवियत्री के कारण कवि विलोचन को कविसम्मेलनों में जहां केवल पांच सौ रुपये मिला करते थे तो महिला कवियत्री के साथ होने पर उन्हें पांच हजार मिलने लगे थे। प्रस्तुत उपन्यास वामपंथ में व्याप्त हताशा, निराशा और उसके कारण संगठन में उपजे भेदों, उपभेदों तथा विचारों में बदलते प्रतिमानों का आइना है। उपन्यास में एल.आर. एक ऐसा पात्र है जो वामपंथ त्याग कर समाजवादी हो जाता है, कारण होता है विश्वविद्यालय में होने वाले चुनाव के दौरान एक भाषण, उसे एक समाजवादी नेता संबोधित कर रहा था, एल.आर. कामरेडों के साथ उस नेता के लिए मंच के पास ही ‘गो बैक’, ‘गो बैक’ का नारा लगा रहा था..समाजवादी नेता ने सुन लिया कि कुछ कामरेड लड़के उसका विरोध कर रहे हैं, फिर तो उसने मंच से ललकारा...
‘‘कहां जाऊं गुरू? यहीं पैदा हुआ, यही पला, बढ़ा और पढ़ा लिखा। मेरी सभा का विरोध न करो, सभी को सुनना सीखो, रही लड़ने की बात तो एक एक करके आओ, फरिया लो।’’ फिर तो समाजवादी नेता मंच से डांक कर जमीन पर आ गया और एल.आर. को पकड़ लिया। समाजवादी नेता ने जांघिया छोड़ कर सारे कपड़े उतार दिये, एल.आर. सन्न और सुन्न.. समाजवादी नेता ने एल.आर. को जबरन मंच पर बिठा लिया और उसे आमंत्रित किया कि वह बोले.. विरोध बोल कर सामने करो, आड़े नहीं। इस घटना ने एल.आर. को बदल दिया और उसने सयुस की सदस्यता ले ली। उपन्यास की भाषा की बात करें तो पूरा उपन्यास काव्यमय है। एक तरफ प्रवासीनाथ हैं तो दूसरी तरफ उनका भाई ब्लाकप्रमुख है जो तीन दलितों को गोली मार देता है और बाद में तीन तिकड़म करके उसी पारटी के टिकट पर चुनाव लड़ कर विधायक बन जाता है। मुकदमे से प्रवासीनाथ प्रधानाचार्या से जुगाड़ लगा कर बरी हो जाते हैं. कथा कहन में बनारसी बोली का ठाठ अद्भुत है..
‘‘थाने गये थे का गुरू? का हुआ?/ होगा क्या, सौ रुपये में सौदा पटा/महिनवारी/ हॉ बंबई जा रहे हो न?/नहीं, जाने का मन था पर अब नहीं जाऊंगा/ काहे?’’ कुछ वाक्य तो बहुत ही अर्थपूर्ण हैं..‘‘यार! यह धन पशु जद्दो भाई तो अन्तःमन से कामरेड है’/ ‘का गुरू कब से जेबा में गुड़ लेके चलय लगला?’ जेल और कचहरी तो मर्दों के लिए ही होती है’/‘हड़ताल, घेराव, प्रदर्शन तो पूंजीवाद के गुप्तांग हैं’’
बनारस में स्थित पप्पू चाय की दुकान की उपन्यास में केन्द्रीय भूमिका है। उपन्यास के सारे पात्र उस दुकान से गुंथे हुए हैं। वहां पर देश की संपूर्ण राजनीतिक गतिविधियों का पोस्टमार्टम होता रहता है, एक अजब तरह की अन्त हीन बहस, पर निर्णायक कभी नहीं। कभी तो देश में राजनीतिक रूप से वैसा ही होता जो पप्पू की दुकान में तय होता। दुकान में अमरेन्दर और सुशीला का प्रवासीनाथ द्वारा अपना उल्लू सीधा करने की बातें हों या बंगाली बाबू की बिटिया को लेकर बंबई भाग जाने की झूठी घटना हो जिस पर प्रवासीनाथ का संस्मरण छपा हो, सभी बातों को लेकर मुहल्ला गर्म हो जाता...उपन्यास में एक कथा चित्र है...
‘एक आदमी रिक्से पर कहीं जा रहा था, गंतव्य पर पहुचकर रिक्से से उतर गया, उसने रिक्से का किराया चुकता किया, रिक्से वाले को किराया कम लगा, उसने एतराज किया, बाकी किराया उसने मांगा। गोया झंझट बढ़ गई, रिक्से वाले ने सांस्कृतिक बयान दिया..
‘गरीब हंू, मार लीजिए, कोई दूसरा होता तो मारते क्या? यात्री ने उसे दुबारा झापड़ मारा, उसने भी सांस्कृतिक बयान दिया...साले! पन्द्रह साल से कुबेर (धन के देवता) को खोज रहा हूं, मिल जाता नऽ , रामकसम पटक पटक कर उसे मारता.. पर मिलता ही नहीं, मिलते तो गरीब हैं फिर किसे मारूं? इसी आशय की कविता थी कवि विलोचन की, गरीब, दलित नहीं मारा जायेगा फिर कौन मारा जायेगा? इसका समाधान न तो जनतंत्र में है और न तो तानाशाही में...क्या ऐसी कोई हुकूमत नहीं जिसमें उसका समाधान हो? एक सवाल...
जद्दो भाई व उनकी ठकुराइन की बातें देखें...
‘रहस्यमय ढंग से ठकुराइन टोंकती...अपने हिस्से का...
ठकुराइन व्यंग्य रूपक गढ़तीं.. कहां से कैसे आपका हिस्सा? आप कहते हैं हमारे देश में गरीबी है... लोग खाये बिना मर रहे हैं... उस पर आप का हिस्सा, यह हिस्सा क्या है?
जद्दो भाई बोलते... ‘‘यार ठकुराइन! तुम तो मार्क्स की बिटिया जैसी जान पड़ती हो, देखो, इस रूप को बनाये रखो, कहीं लेनिन या माओ का बेटा बन गई तो...यह तुम्हारा जद्दो आग में जल जायेगा।’’
नुक्कड़ नाटक के द्वारा हिन्दू मुस्लिम दंगा फैलाकर उसका चुनाव में चाहे राजनीतिक लाभ लेने की बात हो या इच्छाधारी प्रेत की बात हो जो सात समुन्दर पार एक सफेद महल में बसता हो इन कथाक्रमों को रूपकों के द्वारा समय की विसंगतियों पर प्रहार करने का तरीका रामनाथ शिवेन्द्र को एक अलग पहिचान देता है। दलित बस्ती जलाये जाने के विरोध में जद्दो भाई द्वारा किया जाने वाला प्रयास फिर उनकी गिरफ्तारी तथा उस विरोध के द्वारा पप्पू चाय की दुकान के बैठक बाजों को एक साथ जोड़ लेने का प्रसंग भी उपन्यास की गरिमा बढ़ाने वाला है। एल.आर.,जद्दो भाई तथा जगेशर के अनगढ़ चरित्रों का उपन्यास में बहुत ही आकर्षक संयोजन है, सुशीला की तरह। सुशीला है कि वह अपने लिए नहीं जीती, ऐसे चरित्रों को गढ़ने में उपन्यासकार की महारथ दिखती है।
सुशीला अपने गुरुभाई अमरेन्दर के साथ बंबई चली जाती है, उसका मधुर जुड़ाव एक नामी फिल्मी गीतकार से है। वहां वह एक फिल्म बनाती है जिसकी चर्चा जोरों पर है खासकर बनारस में कि वह फिल्म बनारस के अस्सी पर स्थित पप्पू चाय की दुकान के बैठकबाजों पर केन्द्रित है। अचानक एक दिन गीतकार को सुशीला पर सन्देह हो जाता है कि उसका संबध फिल्म के नौजवान प्रोड्यूसर से है, वह उसके कमरे में एक दिन देख भी लेता है। गीतकार तो गीतकार उसने आत्महत्या कर लिया। इसके बाद सुशीला के जीवन में आश्चर्यजनक बदलाव आ जाता है। वह बंबई की सारी संपत्ति अमरेन्दर के नाम से स्थानांतरित करके बनारस चली आती है। बनारस यानि उसके गांव का पड़ोसी शहर। वह उसी गांव में बसने और सामाजिक काम करने का संकल्प ले लेती है जिस गांव का नाम तक उसके पिता के.नाथ कभी किसी को नहीं बताया करते थे। यहां तक कि वे अपने बड़े भाई का नाम भी किसी का नहीं बताते थे। उन्हें दलित कहलाये जाने का डर बना रहता था जबकि सुशीला दलित होने के हीनताबोध के डर से बाहर है। सुशीला अपने पिता का विलोम थी, संभव है बढ़ती दलित चेतना के कारण ऐसा हुआ हो। उपन्यास में दलित चेतना के उत्कर्ष के प्रभावकारी विवरण हैं तो जन संघर्ष के भी हैं। कुल मिला कर उपन्यास में अमरेन्दर तथा सुशीला के प्रेम की शुचितापूर्ण गाथा है तो प्रवासीनाथ के वैयक्तिक प्रतिभा के छद्म के उत्कर्ष का भी। सुशीला द्वारा अपना जीवन गांव के विकास के लिए समर्पित कर देना तथा अपनी जड़ों की तरफ लौटना किसी चुनौती की तरह है जैसा कि अमूमन नहीं हुआ करता। गांव में उसे दलित जन ही नहीं सवर्ण भी प्यार करने लगते हैं वह अपने गांव में स्कूल तथा अस्पताल खुलवाती है तथा गांव से बाहर पढ़ने वाले छात्रों को स्कालरशिप भी देती है। अपनी कार्ययोजना को सुचारु रूप से चलाने के लिए वह जद्दो भाई, एल.आर. तथा बंगाली बाबू की बिटिया को भी जोड़ लेती है। उसके स्कूल के प्रबंधन को लेकर क्षेत्र के बाहुबली विधायक से भी उसे पंगा लेना पड़ता है। दरअसल बाहुबली नहीं चाहता कि सुशीला दलितों व सवर्णों को एक साथ जोड़ कर चले तथा विद्यालय चलाये। पर सुशीला तो सुशीला वह बाहुबली से पंगा ले ले लेती है। एक घटना के दौरान सुशीला के स्कूल के छात्र बाहुबली का विद्यालय परिसर में ही कुटम्मस कर देते हैं फिर तो पुलिस, सरकारी दमन। विधायक सत्ता पक्ष का होता है पर सुशीला उससे नहीं डरती, वह तनेन खड़ी है। प्रशासन विद्यालय बन्द करा देता है, परिसर में पुलिस का पहरा लग जाता है सुशीला इस दौरान एस.पी. से भी भिड़ जाती है। मुकदमे का अन्तहीन सिलसिला पर हाई कोर्ट का आदेश सुशीला के पक्ष में आ जाता है, विद्यालय फिर से शुरू हो जाता है। मरने जीने की परवाह किये बगैर सुशीला ने बाहुबली के खिलाफ चुनाव लड़ने का निश्चय किया। सुशीला द्वारा बाहुबली के खिलाफ चुनाव लड़ने का निर्णय लेने के बाद उपन्यास समाप्त हो जाता है। आगे क्या हो सकता है? इसका निर्णय पाठकों पर शिवेन्द्र जी छोड़ देते हैं। ऐसा करना उपन्यासकार की लेखकीय कुशलता है। पाठक भी तो सोचें... आशा है शिवेन्द्र जी का प्रस्तुत उपन्यास भाषा, शैली तथा कथा के प्रस्तुतीकरण की काव्यात्मकता प्रभावित करेगी उनके अन्य उपन्यासों की तरह।
उपन्यास- अन्तर्गाथा अमरनाथ अजेय
रचनाकार- रामनाथ शिवेन्द्र वार्ड नं. 09, नई बस्ती
प्रकाशक- नेहा प्रकाशन, रावर्ट्सगंज, सोनभद्र, उ.प्र.
उलधनपुर, नवीन शाहदरा दिल्ली, 110032 मो. 8009388018
दूरभाष-9899486788
प्रकाशित......कथाक्रम जनवरी-मार्च 2017 पृ...99-101
अनसुलझे सवालों की पड़ताल करता रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास ‘कनफेशन’
अमरनाथ ‘अजेय’
संबंधों के बीच न जाने कितने सवाल हैं, जो अब तक सुलझाए नहीं जा सके हैं, जिनसे टकराते हुए व्यक्ति की आत्मा चटक-चटक कर विदीर्ण हो रही है जिसके लिए कोई मरहम कारगर नहीं दीखता। संबंध चटकने की टकराहटें इतनी तेज होती हैं कि उसकी आवाजें संवेदनशील साहित्यकार के लिए सर्जना का विषय-वस्तु बन जाती हैं। कविता, कहानी, लेख, संस्मरण और उपन्यास की शक्ल मंे ढलकर देश, काल व समाज के लिए अमूल्य कृति बन जाती हैं। सामाजिक संरचना में भूमि, संपत्ति तथा नारी अस्मिता के सवाल प्रमुख रूप से मानवीय संबधों को चालित करतेे हैं। यह सच है कि नर, नारी के संबंधों की सुकुमार प्रवृत्ति यॉ ही मानव सभ्यता को गतिशील करते हुए ऊॅचाई तक ले जाती हैं।
चर्चित लेखक रामनाथ शिवेन्द्र का उपन्यास ‘‘कनफेशन’’ नर, नारी के मानवीय संबंधों की विसंगतियों के धरातल पर बुना गया उनका नया उपन्यास है। नारी को उपभोग की वस्तु मान कर उसके साथ बनाए जाने वाले संबंधों की परिणति ‘एड्स’ जैसे रोग तक जा पहुॅचती है। यह कितना भयानक होता है इसका अनुमान किसे नहीं। आखिर देह व्यापार का मामला आज केी विकसित दुनिया क्यों नहीं खतम कर पा रही है अचरज होता है। देह को भी व्यापार की वस्तु बना दिया गया है। मन, तथा वुद्धि के बेचे जाने का तो बाजार ह हीै, दोनों बेचे जा रहे है बाजार में, दोनों के कानूनी तथा गैर कानूनी बाजार हैं। बिक दोनों रहे है तन भी मन भी।
देश के पूर्वोत्तर र मंे स्थित उ0प्र0 का सोनभद्र जिला पहाड़ी और आदिवासी बाहुल्य है। इन आदिवासियों के सुख-चैन मे सेंध लगाते हुए कल-कारखानंे इन्हें किसी लायक नहीं छोड़ रहे हैं। इनकी पुस्तैनी जल, जंगल और जमीन पर से इनके विस्थापन का दंश इनके अस्तित्व को समाप्त करता जा रहा है क्योंकि, इन्हें इनसे मिलता है, चिमनियों का काला धुआं, कारखानों से निकलता विषाक्त जल जिससे वे असमय ही मृत्यु के मुह मंे समा जा रहे हैं। प्रदूषण की मार सहते हुए ये आदिवासी आर्थिक तंगी का भी सामना कर रहे हैं। भुखमरी की समस्या के समाधान के लिए परदे के अन्दर-अन्दर इनकी बहन-बेटियां देह बेचकर अपने परिवार की भुखमरी की समस्या का समाधान कर रही हैं, जिसकी जानकारी प्रकाश मे आ रही है। शिवेन्द्र का उपन्यास ‘‘कनफेशन’’ देह-व्यापार और उससे उपजी विसंगतियों का विस्तृत पड़ताल करता हैं, जो कथानक व शिल्प के स्तर पर अपनी तरह का नया है। देह-व्यापार के दलदल में फंसे एड्स रोगियों की समस्या व उसके समाधान के लिए एक संस्था के माध्यम से एक युवती के सर्वेक्षण की रिपोर्ट अत्यंत रोचक व चौकाने वाली है।
एक एन.ज.ी.ओ. से जुड़ी शशि जिसकी उपन्यास में प्रमुख भूमिका है उसका पति खुद भी देह-कौतुक में फंसकर एड्स का मरीज हो गया है। वह अपनी पत्नी पर देह के विविध खेलों का प्रतिभागी होने के लिए घृणित दबाब डालता है जिसे वह निर्ममतापूर्वक ठुकरा देती है। और आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए एक संस्था में कार्य करने लगती है। शशि के अलावा उपन्यास में कई महिला पात्र हैं, जो अपने अस्तित्व के लिए जद्दोजहद करती हुई औपन्यासिक कृति ‘कन्फेशन’ की औपन्यासिक कथा की ताकत बनती हैं। आज जहां, सामाजिक समानता के लिए राजनीतिक क्षेत्र मंे स्त्री सशक्तिकरण पर विशेष बल दिया जा रहा है, वहीं साहित्य के क्षेत्र मंे भी स्त्री-विमर्श के नाम पर स्त्री पात्रों को कहानियों व उपन्यासों में भी इन्हें अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए संघर्ष करते हुए दिखाया जा रहा है। समीक्ष्य उपन्यास में पुरूष पात्रों की संख्या नगण्य है पहला पुरुष पात्र तो उपन्यासकार खुद है और दूसरा एक वी.डी.ओ. है कुछ जो दूसरे पुरुष पात्र हैं वे तो केवल पूरक हैं फिर भी उपन्यास नारी विषयक उपन्यासों से अलग है कथ्य, तथ्य तथा भाषा के स्तर पर।
रामनाथ ‘शिवेन्द’्र के उपन्यास ‘कनफेशन’ की स्त्री पात्र घर से बाहर निकलकर विभिन्न स्तर पर संघर्ष कर रहीं हैं। शशि के अतिरिक्त एक और पात्र है लाैंगी, जो घर के खाना- खर्चे का भार स्वयं अपने सिर पर उठाती है। उसका पिता बीमार हैं घर में कमाने वाला कोई नहीं है। पेट खर्ची के लिए उसकी अइया (मॉ) उसे देह व्यापार में झोंक देती हैं। एक दिन वह प्रधान से पैसे लेकर उसे उसके यहां भेजती हैं, जहां प्रधान उसकी देह नोचता खसोटता है। वह अपनी अइया से इसकी शिकायत करती है परन्तु अइया नहीं सुनती, उसे ही
भला बुरा कहती है। वह थाने भी जाती है पर थाना उसे ही रपट बना देता है। लौंगी प्रधान से प्रतिशोध लेने के लिए उसे, और फिर उसके बेटे को अपना एड्स रोग बांटने की कोशिश करती है। क्योंकि उसे एड्स है वह जानती है कि एड्स देह धरे का रोग है, देह संबंध से ही फैलता है। वह परधान को एड्स में फसा देती है। एक दिन परधान मर जाता है। ऐसा भी नहीं कि वह यह धंधा करते हुए विल्कुल ही संवेदनशून्य हो गई हो। स्त्री की स्वाभाविक संवेदना उसके भी अन्दर है। साथ ही शारीरिक करतब भी। तभीं तो बी. डी. ओ. जिसकी पत्नी मर चुकी है, उसके शारीरिक व संवेदनात्मक कौतुक पर वह आकर्षित है। यहां तक कि उसे एड्स है, यह जानकर भी। इसीलिए लाैंगी भी बी.डी.ओ. से सहवास के वक्त कंडोम लगवाना नहीं भूलती। वह तो कभी की उससे शादी कर चुकी होती, परन्तु लौंगी को अपनी जिम्मेवारियां अच्छी तरह याद हैं। घर की परवरिश उसे ही करनी है! साथ ही बी. डी. ओ. का भी ख्याल रखना है कि उसे एड्स न हो जाय। उस आदिवासी बाला से बी.डी.ओ. का भी प्रेम खूब कुलांचे भर रहा है। यहां तक कि लौंगी के बीमार हो जाने पर उसे अस्पताल मे भरती करवाना व उसकी रात-दिन तिमारदारी करना साथ ही दवा-दारू में पैसे की कमी न होने देने तक बी. डी.ओ. उसका ख्याल रखाता है। उपन्यास में एक और औरत है, थाने वाली महिला के नाम से, वह थाने पर अपने पति को छुड़वाने के लिए जाती है तो, थानेदार उसे ही अपने हबस का शिकार बना लेता है फिर तो थाने वाली महिला आग बन जाती है मानो जला देगी थाना। वह थाने पर ही हंगामा कर बैठती है। वह थानेदार के निलंबन तक संघर्ष करती है। थाने वाली महिला तो उपन्यासकार को भी नहीं छोड़ती फटकारती है, अपनी मौलिक शैली में....
‘‘तूं का लिखेगा मेरे बारे में? तूं भी तो मरद जाति का है, थूथुन वाला, कहते हैं, नाक न हो तो मैला खाने वाला, तूं का जानेगा मेहरारू के बारे में कि मेहरारू का होती हैं। मेहरारू को तूं जब जैसा चाहता है वैसा गढ़ देता है कभी देवी बनाता है तो जरूरत के हिसाब से रण्डी बना देता है। देवी बना कर माला फूल चढ़ता है, तो रण्डी बना कर जोंक की तरह चूसता है, देह को बिछौना बना देता है, खुश, हुआ तो खेत बना कर जोतने कोड़ने लगता है, बेंगा डाल देता है, खेत में जब बेंगा पड़ जाता है तो कुछ न कुछ जामेगा ही। जाम जाने के बाद दूसरा बेंगा डालने के लिए उसे फिर जोत भी देता है। देखना है तो दारोगा को देख कि वह का कर रहा? फिर दारोगा को भी तूं काहे देखेगा, खुद अपने को देख ले, तोहरे मुहें में मेहरारून के बारे में विषैला लार है कि जलता हुआ लोर है। पर तोहरे पास लोर कहां से होगा? लोर तो मेहरारून के पास होता है, जो उनके दिलों को लगातार हिलोरता रहता है।’ पृ..73
इन महिलाओं के अतिरिक्त एक अन्य महिला पात्र लाजवंती भी है, जो देह की सीढी से चढकर नौकरी तक की उंचाई प्राप्त कर लेती है और अपने पिता पर चढे कर्ज को उतार देती है। देह के धंधे सड़क के किनारे होटलों व ढाबों में निरन्तर हो रहे हैं, जिसकी जानकारी एक सामाजिक कार्यकर्ता शशि को एड्स के रोगियों से मिलने के दौरान होती है। इस उपन्यास के माध्यम से उपन्यासकार ने कुछ अपनी धारणाओं व प्रस्थापनाओं को भी उकेरा हैे।
क्या पत्नी का अधिकार अपने शरीर पर भी नहीं है? वर्ण, जाति व गोत्र की तरह स्त्री स्वातंत्र्य का भी सवाल अनुत्तरित है। उच्च पदाधिकारी जनता का व्यक्ति नहीं होता, वह जनता से एक निश्चित दूरी बना कर रहता है।’
सोनभद्र में पचासों चेकडैमों के नाम पर करोड़ों रुपयों का गमन किया गया, जो जांच के दौरान उजागर हुआ था, उपन्यासकार ने इसे उपन्यास में वर्णित कर उपन्यास का वजन बढाया है। उपन्यासकार ने एक उपन्यासकार के अस्तित्व-बोध पर भी सवाल खड़ा किया है कि वह अनुत्पादक कार्यों मे अपना जीवन खपा देता है। उसे हासिल कुछ भी नहीं होता। प्रकाशक तक उसकी उपेक्षा करते हैं पाठकों की तो बात ही अलग है। सेक्स जोन के गांवों मंे जिस परिवार में देह व्यापार से जितना अधिक धन-संग्रह होता है, उस परिवार की इज्जत गांव मंे उतनी ही बढ जाती है। देहव्यापार को मर्यादा से जोड़ना आखिर कैसा सन्देश देता है? सवाल है? प्राकृतिक आपदा के चलते जब कोई किसान खेत का मालगुजारी या पनिकर नहीं दे पाता, तो उस किसान को चौदह दिनों तक तहसील की हवालात मंे किस बात की सजा काटनी होती हैं? यह सवाल उभरा है लाजवंती के बहाने। लाजवंती अमीन की डर से तहसीलदार के पास जाती है फरियाद करने के लिए कि उसके बाप को गिरफ्तार न किया जाये। उसकी फरियाद सुन व गुन लेता है तहसीलदार। उसके बाप को तहसील की हवालात में नहीं जाना पड़ता। फरियाद सुनने के एवज में तहसीलदार लाजवंती की देह से खेलता है, यह बात और है कि उसे तहसील में नौकरी भी दिलवा देता है। पर ऐसा सभी के साथ तो होता नहीं वह
तो महज संयोग का खेल था कि लाजवंती को नौकरी मिल गई नही ंतो कुछ नहीं मिलता सिवाय अपमान के। ज्ञातव्य है कि सोनभद्र के गरीब, किसान कर्ज वसूली के संकट से लगातार गुजरते रहे हैं।
उपन्यास की भाषा भी खूब खूब है... देखें....
‘नेह अगर है तो, देह नहीं झूलती। मर्द के पास लार व स्त्री के पास लोर ही तो होता है। मर्द जब चाहे तब जिस पर चाहे लार टपका दे, और औरत दुखों मे सिर्फ आंसू ही बहाती रहे।’
‘मर्द और बर्द पर जवानी का जुआ रख दीजिए और जहां चाहे तहां ले चलिये।’ ‘अनब्याही बाला को यदि बच्चा पैदा हो जाता है, और जिसकी करनी से बच्चा पैदा हुआ हो, वह व्यक्ति बच्चा लेने से या उस औरत से शादी करने से इंकार करता हो तो मां को चाहिये कि,उस बच्चे को निःसंकोच पालपोष कर बड़ा करे और बाप से बदला लेने के लिए उसे तैयार करे। गर्भ में या पैदा होने पर बच्चे की हत्या न करे।’
उपन्यास में एक नारी पात्र है लौंगी जो सेकेन्ड सेक्स की ‘फुकुयामा’ की अवधारणा से अधिक स्वतंत्र व संघर्षशील है। पीत पत्रकारिता को भी लेखक ने एक पात्र के माध्यम से आड़े हाथों लिया है, जो पठनीय बन पड़ा है। प्रकाशकों द्वारा लेखकों को प्रताड़ित करने की बातें भी उपन्यास के माध्यम से कही गई है। लेखक स्वयं को भी नही छोड़ता है। वह कहता है कि,
‘जैसे थानेदार महिला से बलात्कार करता है ठीक उसी तरह से एक लेखक भी महिला को जहां चाहे तहां पटक देता है उपन्यास में। लेखक भी महिला को लेकर कम दोशी नहीं।’
उपन्यासकार का मानना है कि, जाति व योनि के दोनों कटघरे पूंजीमूल्यबोध का ही प्रचार करते हैं। स्त्री-स्वातंत्र्य के प्रसंग में लेखक ने स्वीकार किया है कि, काश! स्त्री और पुरुष के रिश्ते नदी और कहू (अर्जुन का पेड़) की तरह होते। नदी न तो पेड़ का गिराती है और न ही पेड़ नदी को क्षतिग्रस्त करता है, दोनों अर्न्तलयित होते हैं एक दूसरे में ।
एक मिथक का भी प्रयोग उपन्यासकार ने बखूबी से किया है। ‘‘हां, वहीं त्रिशंकु जिसे स्वर्ग के रक्षा-कर्मियों ने स्वर्ग में घुसने नही दिया। किसी तरह वह नर्क से बाहर निकला, फिर लटक गया, स्वर्ग ओर नर्क के बीच जिसके आंसुओं, खखारों और लारों से धरती पर कर्मनाशा नदी बह निकली, किसी शोक कविता की तरह।’’
प्रभावकारी भाषा, तथा कलात्मक शिल्प के द्वारा उपन्यासकार ज्वलंत सवालों पर अपनी राय देने में पीछे मुड़कर नहीं देखता। सोनभद्र में एक ओर भूख से कराहते व बिलबिलाते लोग हैं तो दूसरी ओर तिजोरियों से खेलते लोग। नोटों के बिस्तरेां पर धनी होने के धार्मिक अनुष्ठान करते हुए।’’ घृणित दर्जे की यह आर्थिक असमानता सोनभद्र में वाम उग्रवाद के फैलाव के कारणों में से है। शशि के पति की आत्महत्या वाली घटना पर एक आदिवासी बाला की स्वाभाविक साफ बयानी यहां देखने योग्य है.....
‘‘एड्स हो गया था तो क्या हो गया। यह तो पहले गुनना चाहिये था न ! फेर आत्महत्या से रोग खतम होगा का ?लौंगी को भी तो एड्स हुआ हैे। वह तो आत्महत्या नहीं कर रही। लड़ रही है समय से....शशि के पति को भी लड़ना चाहिये था रोग से...।’’
आदिवासियों की जमीनें जहां से वे विस्थापित कर दिये गये, वहां बड़े-बड़े कल-कारखानें बना दिये गये हैं। उन कल-कारखानों में भी इन आदिवासियों को रोजगार नहीं मुहैया कराया गया, जो बड़ी त्रासदी है। लेखक ने कारखानों की चमक -दमक की दुनियां की आड़ मंे फैल रहे देह-व्यापार के इस विष-बेल को, जो बड़े फलक वर व्याप्त है, को एक छोटे से उपन्यास में करीने से कहने का करिश्माई कार्य किया है। उपन्यास के सभी चरित्र जीवन के खुरदरे रपटों को सही- सही कनफेश करने मे कहीं से कोताही नहीं करते। किसी न किसी बहाने सभी पात्र कन्फेश करते हैं चाहे लौंगी हो, लाजवंती हो, या शशि का पति हो। उपन्यासकार भी कन्फेश करता है वह अंश यहां प्रस्तुत करना आवश्यक जान पड़ता है.... देखें उक्त अंश...
‘साला उपन्यासकार बनता है। एक दारू चुआने वाली आदिवासी महिला को पकड़ लिया उपन्यास में और उसे कप्तान तक पहुंचा दिया। अक्षरों की गाड़ी पर बिठा कर, दौड़ाने लगा किसी रेसर की तरह। इतना तेज किस्मत के भरोसे वाले किसी पात्र को दौड़ाया जा सकता है भला! वह भी उपन्यास में, फिल्म की बात दूसरी है, पात्रों को चाहे जितना दौड़ा दो, एक अदना सा हीरो आठ दस आदमियों को मार गिराता है। ऐसा तो केवल फिल्म में ही चलता है पर उपन्यास में... फिल्म की रील की तरह पन्नों को फड़फड़ना ठीक नहीं, संभल कर चलना होता है। उपन्यास में तो एक कदम भी गलत उठा तो शीलभंग होना निश्चित है। किसी लड़की का शीलभंग होने तथा उपन्यास के शीलभंग होने में धागे भर का भी अंतर नहीं.. लेखन की शुचिता भी तो कोई चीज होती है नऽ।’ पृ...63
शशि का पति जो, देह के कौतुकों में फंसकर अपना जीवन वरबाद कर चुका था, और जिसे वह त्याग ही चुकी थी, वह भी अन्त में मरने से पहले एक चिट्ठी छोड़ जाता है, जिसपर शशि कहती है कि....
‘‘वे दस दिन अस्पताल में पड़े रहे, ऐसा नहीं था कि, मैं उनकी सेवा न करती,... एक चिट्ठी छोड़ गये हैं हमारे नाम, चिट्ठी क्या है, मृत्यु-शैय्या पर पड़े आदमी का कनफेशन है। एक तरह से वह चिट्ठी मृत्यु का दस्तावेज है।’’ उपन्यास में पाठकीय आकर्षण है। अस्तु यह ‘कनफेशन’ उपन्यास अत्यंत पठनीय है।
समीक्ष्य उपन्यास
उपन्यास- कनफेशन लेखक-रामनाथ ‘शिवेन्द्र प्रकाशक-मनीष पब्लिकेशन,दिल्ली 441/1 मूूल्य-600/
पट्टा चरित
चरित उपन्यास के बारे में कुछ कहना, न कहना दोनों बराबर है। उपन्यास खुद आपसे संवाद करेगा, संवाद ही नहीं प्रतिवाद भी करेगा तथा अपने सृजन के बारे में बाजिब बयान भी देगा तथा बताएगा कि मौजूदा शदी में भी इस उपन्यास की जरूरत क्या है? वैसे यह बता देना लेखकीय औचित्य है कि इसकी कथा आठवें दशक में ही उपन्यास का रूप धर कर ‘सहपुरवा’ उपन्यास के नाम से मेरे मित्रों के सहयोग से प्रकाशित हो चुकी थी। वह मेरा पहला औपन्यासिक प्रयास था। इसमें पात्रों के संवाद की भाषा हिन्दी तथा भोजपुरी बलिया, गोरखपुर, आजमगढ़, जौनपुर वाली नहीं थी बल्कि ठेठ बनारसी या बिजयगढ़िया थी। संवाद के अलावा सारा कुछ खड़ी बोली में था।
तो कथा पुरानी है आपात काल के आस पास की। सवाल है कि पुरानी कथा को फिर से क्यों? आठवें दशक से लेकर अब तक के गॉवों की जॉच पड़ताल कर लीजिए और एक झटके से आपात काल को फलांग कर इक्कीसवीं शताब्दी में घुस आइए फिर देखिए कि क्या गॉव बदल गये? गॉवों की संस्कृति बदल गई? और गॉव ऐसे हो गये कि बिना संकोच ‘अहा ग्राम्य’ कहा जा सके, हॉ गॉवों से पोखर गायब हो गये, पनघट गायब हो गये, आजादी मिलते ही किसिम किसिम के विस्थापित पैदा हो गये, कुछ कारखानों के निर्माण के कारण, कुछ सड़कांे, नहरों के निर्माण के कारण तो अधिकांश वन प्रबंधन की दादागिरी और वनअधिनियम की धारा 4 तथा 20 के कारण। तो गॉवों में अब जो निवसित हैं वे या तो विस्थापित हैं या ऐसे है जो शहर में कहीं खप नहीं सकते।
होमगार्ड से लेकर स्कूल के मास्टर तक, चपरासी से लेकर बड़े ओहदे तक का पदाधिकारी बना कर तन बल तथा वुष्द्वि बल वाले व्यक्ति को गॉवों से छीन लिया गया है, कोशिश की गई है और की जा रही है कि वे गॉव में रहने न पाये, उन्हें किसी भी तरह से सत्ता प्रबंधन से जोड़ लिया जाये। वही हुआ। आज के समय में गॉव में वही बचे हुए है जिनके पास जीवन जीने के लिए कहीं कोई ठौर नहीं तथा वे चौदह दिन की हवालात की योग्यता वाले हैं। इनसे गॉव तो नहीं बचेगा।
इस उपन्यास का केन्द्रीय विषय है भूमिहीन गरीबों को भूमि आवंटन। आपात काल
के दौरान कांग्रेस का यह प्रशंसनीय अभियान था जिसे बाद में किसी ने लागू
नहीं करवाया।अभियान तो ठीक था पर जो तत्कालीन सामंत थे उनके लिए यह अभियान महज राजनीतिक खेल था। प्रस्तुत उपन्यास में सवालों दर सवालों से गुंथी वही कहानी दुहराइ गई है कि आजादी के बाद कितनी आजादी मिली लोगों को, सन्दर्भ आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक या राजनीतिक किसी भी तरह का हो। एक भूमिहीन व्यक्ति गॉव में कैसे निवसे, किस तरह से रहे? रहे तो किस किस को सलाम करे यह सवाल जैसे पहले था वैसे आज भी है।
यह तो नहीं कहा जा सकता कि गॉव नहीं बदले, गॉव बदले हैं पर गरीबी का प्रतिशत जिन जिन क्षेत्रों में जैसे पहले था वैसे ही आज भी है। इसी लिए कहा जाना चाहिए कि गरीबी पूॅजीवादी सत्ता प्रबंधन का आर्थिक उत्पादन है और आज तो गरीबीे उत्पादन में वृद्धि हो चुकी है। आखिर किसे पड़ी जो जिसकी जितनी हिस्सेदारी उसकी उतनी भागीदारी इस पर गुने जाहिर है कि गरीबी पूॅजीवादी सत्ता प्रबंधन की रहस्यमय आर्थिक प्रक्रिया है गरीबी रहेगी तभी तो अमीरी रहेगी। हॉ गरीबी की उग्र भूख गरीबों में पैदा न होने पाये इसके समाधान के लिए पूॅजीवादी सत्ता प्रबंधन सभी को भोजन का अधिकार, सभी को शिक्षा का अधिकार, सभी को बुनियादी आय तथा कुछ मामलों में सब्सिडी जैसी रियायतें प्रदान किया करती है जिससे सरकार की छवि लोकतांत्रिक बनी रह सके। पर इससे क्या होगा?
होगा तो तब जब यह पता लगाया जाये कि महज दस फीसदी लोग देश की समस्त कुदरती संपदा पर काबिज कैसे हैं, कौन कौन से कानून है जो उन्हें अमीर बनाते हैं। हमारे कानूनों में कहॉ कहॉ दरारे है जिनमें से इस कथा के रामभरोस जैसे लोग सभी की छाती पर कोदो दरकर उग जाया करते हैं जिनके दमन से फेकुआ, सुमिरनी, औतार, जोखू तथा बिफना को गॉव से भागने के लिए विवश होना पड़ता है। प्रस्तुत उपन्यास का यही आशय है कि हम पता लगा सकें कानूनी दरारों को जिनसे होेते हुए दमन हमारे ग्राम्य संस्कृति तथा जीवन को लील रहा है। चिमनियॉ चाहे जितनी उग जॉये पर गॉव की हरियाली तथा पनघट की मोहकता नहीं पैदा कर सकतीं। जीवन तो गॉवों में है क्योंकि वहॉ अनाज के दाने हैं, दानों पर मन के संगीत लिपे पुते हैं, उसे मन के राग संवारते हैं पोंछते है, बीनते हैं। आइए गॉव बचायें गॉव के लिए कुछ करें। आशा है प्रस्तुत उपन्यास पाठकों की कुदरती प्रतिक्रियाओं को हकदार बनेगा। इसी आशा में....
रावर्ट्सगंज,सोनभद्र 2019
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